eklavya kaun tha unka janam kahan hua tha

एकलव्य कौन था 

दोस्तों एकलव्य महाभारत का गुमनाम सा पात्र है बहुत  लोग है जो एकलव्य के बारे में जानते है. जो लोग अर्जुन को महाभारत का सबसे महन धनुर्धर  मानते है  वो बिल्कुल गलत है महान तीरंदाज  एकलव्य  के बारे में मेने एक कविता  है। उसकी कुछ पंक्तियाँ  यहां लिख रहा हु। 

एकलय में छोड़े तीर। तीरंदाज में महान था गुरु द्रोण मांगा अंगूठा दिया मेने दान था  

 महान धनुर्धर एकलव्य के बारे बहुत ही काम लोग जानते है और जानते है तो बस इतना की  एकलव्य नाम का एक धनुर्धर था।  जिसको गुरु द्रोण  ने शिक्षा देने से मन कर दिया था। लेकिन एकलव्य ने द्रोण की मूर्ति बना के उसे कपङा गुरु समझा और शिक्षा ग्रहण की और जब ग्रुरु द्रोण को ये पता चला तो उन्होंने एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिआ

लेकिन दोस्तों आगे बढ़ने से पहले हम आपको एकलव्य के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे देते है जैस

eklavya kaun tha unka janam kahan hua tha

धर्म ग्रन्थ महाभारत के अनुसार द्वापुर युग में प्रयाग राज निकट श्रृंगवेरपुर नाम का एक राज्य हुआ करता था। जिसके राजा हिरण्य धनु थे एकलव्य  निषाद राज हिरण्य धनु का पुत्र था महाभारत कल के समय निषाद समाज को शूद्र मन जाता था।  इसी लिए हमें उनके बारे में ज्यादा पड़ने को नहीं मिलता है।  एकलव्य के बचपन का नाम अभिदुन्य था हालाँकि कुछ लोगो का यह भी मन जाता है की बचपन में एकलव्य अभय नाम से भी जाना जाता था। एकलव्य बचपन से एकाग्र बुद्धि का धनि था।  उसे शिक्षा और धनुष बिद्या में अधिक रूचि थी। उनका एक लव्य नाम उनके गुरु ने रखा था। क्योकि वे बहुत ही तेज़ बुद्धि के थे। उसी  गुरुकुल में एक बार पुलक मिनी ने एकलव्य के धनुष बाण सिखने की लगन आत्मविश्वास से भरा देखा तो उन्होंने निषाद राज हिरण्य धनु से कहा की आपके पुत्र एक लव्य में एक बेहतर धनुर धारी बनने के सरे गुण मौजूद है बस उसके बाद हिरण्य धनु अपने पुत्र को गुरु द्रोण  के पास ले गए और उनसे एकलव्य को अपना शिष्य बनाने का आग्रह की लेकिन ग्रुरु ने ये कहकर मन कर दिया की वो सिर्फ राज पुत्रो को ही शिक्षा देंगे लेकिन एक लव्य ने तो गुरु देव को अपना गुरु मान लिया था। .लेकिन गुरु द्रोण  की ये बात सुनकर हिरण्य धनु और उनके पुत्र निराश होकर वापस आ गए 
परन्तु एक लव्य गुरु ड्रोन को अपना ग्रुरु मान चूका था और वो यह जानता था  धनुर विद्या उसे कोई नहीं सीखा सकता। एकलव्य ने आश्रम के पास ही  में गुरु ड्रोन की मूर्ति का निर्माण किया और उसी प्रतिमा को अपना गुरु मान कर रोजाना धनुर विषय का अभ्यास करने लगा 
उसी तरह बहुत समय व्यतीत हो गया   और एक दिन जो ग्रुप दौड़ सभी कौरवों और पांडवों को धनुष विद्या सिखा रहे थे तो अचानक से कुत्तों के भौंकने की आवाज आई जिस वजह से सभी का ध्यान भटक गया और कुछ समय बाद मैं आवाज बंद हो गई और सभी कौरव और पांडव हैरान हो गए और वे सभी उसी ओर दौड़े जिस ओर उस कुत्ते की आवाज आ रही थी
वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि किसी ने कुत्ते के मुंह को बाणों से भर दिया है और रक्त की एक बूंद भी नहीं गिरी यह देख कर सभी एक दूसरे को देखने लगे
 तब गुरुद्वारों ले कि यह हाल किसने किया है एकलव्य आया और उसने कहा कि गुरुदेव आपकी कृपा से यह मैंने किया है एकलव्य की यह बातें सुनकर विरोध में बोले कि बालक तुम कौन हो और मैं तुम्हारा गुरु कैसे हूं तो मैं हिरण धनु का पुत्र एकलव्य हूं और कुछ समय पहले हम आपसे शिक्षा ग्रहण करने के लिए आपके पास आए थे लेकिन आपने यह कहकर वापस लौटा दिया कि मैं केवल राज पुत्रों को ही शिक्षा देता हूं लेकिन मैंने आप की प्रतिमा बनाकर शिक्षा ग्रहण की और धनुष विद्या में निपुण हो गया
 यह बातें सुनकर गुरु द्रोण को एहसास हुआ कि मुझे एकलव्य को अपना शिष्य बनाना चाहिए . 
यह सुनकर गुरु द्रोण  एकलव्य को गले लगाने के लिए। आगे बढ़े और कुछ कदम चलने के बाद रुक गए उन्हें उस बचन की स्मरण  हुआ जो उन्होंने अर्जुन को दिया था कि मैं तुम्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाऊंगा । 
और गुरु द्रोण रुको गए और उन्होंने एकलव्य से कहा
चलो तुम मुझे मेरी प्रतिमा दिखाओ प्रतिभा को देखकर गुरु द्रोण मन ही मन प्रसन्न हुए
गुरु द्रोण ने एकलव्य से कहा कि आज से तुम मेरे शिष्य हो
 और तुम यह भी जानते होंगे कि जब तुम मेरे जैसे हो तो तुम्हें गुरु दक्षिणा भी देनी होगी तभी शिक्षा पूरी होती है और उन्होंने ने कहा कि मैं गुरु दक्षिणा में तुम्हारे दाएं हाथ का अंगूठा मांगता हूं पहले तो एकलव्य  चुप खड़ा हो गया फिर कुछ देर बाद  एकलव्य ने अपना अंगूठा काट दिया और वे सभी अपने अपने घर चले गए। 
घर लौटने के कुछ वर्ष बाद भी एकलव्य का विवाह उनके पिता ने अपने मित्र की बेटी  सुनीता से एकलव्य का विवाह करा दिया
 पिता के देहांत के बाद एकलव्य ने अपने राज्य पर शासन किया और वह अपनी राज्य की सीमाएं बढ़ाएं लगा फिर वह  मगध नरेश  जरासंध से मिल गया और जरासंध के साथ मिलकर उन्होंने एकलव्य निमावत के नरेश के साथ मिलकर द्वारिका पर आक्रमण कर दिया और धीरे-धीरे करके एकलव्य ने यादवों की आधी से अधिक सेना को वही ढेर कर दिया तो श्रीकृष्ण ने देखा कि यह चारों उंगलियों से यादवों की आधी से अधिक सेना को ढेर कर चुका है तो मैं आगे होने वाले महाभारत में कौरवों के लिए हानि हो सकता है तो उन्होंने एकलव्य से युद्ध किया और एकलव्य वहां वीरगति को प्राप्त हो गया

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